
लखनऊ। पूर्व विधान परिषद सदस्य बृजेश सिंह ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘पितृसत्ता को खत्म करने’ संबंधी बयान पर तीखा कटाक्ष किया है। बृजेश सिंह ने एक लेख के माध्यम से राहुल गांधी की टिप्पणी पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी भी राजनीतिक विचारधारा या नारे का इस्तेमाल करने से पहले उसके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ को समझना जरूरी है।
बृजेश सिंह ने अपने लेख की शुरुआत करते हुए कहा कि वह पहली बार किसी राजनीतिक मुद्दे पर बोल रहे हैं, क्योंकि मामला धर्म से जुड़ा हुआ है। उन्होंने राहुल गांधी के ‘पितृसत्ता को खत्म करने’ के आह्वान को लेकर कहा कि बार-बार इस मुद्दे को उठाना और अधिकांश आलोचना हिंदू सामाजिक रीति-रिवाजों पर केंद्रित रखना विरोधाभासी नजर आता है।
उन्होंने अपने लेख में हिंदू समाज में समय-समय पर हुए सामाजिक और कानूनी सुधारों का उल्लेख किया। बृजेश सिंह ने सती प्रथा के उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता, बाल विवाह पर रोक, हिंदू विवाह अधिनियम-1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम-1956 तथा वर्ष 2005 के संशोधन समेत महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कई कानूनों का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि सामाजिक सुधार केवल हिंदू व्यक्तिगत कानूनों तक सीमित नहीं रहे। दहेज निषेध अधिनियम-1961 और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम-2005 जैसे कानूनों के जरिए भी महिलाओं को कानूनी अधिकार और सुरक्षा प्रदान की गई। उनके मुताबिक, इन सुधारों ने हिंदू समाज को खत्म नहीं किया, बल्कि यह दिखाया कि समाज अपनी परंपराओं पर सवाल उठाकर भेदभावपूर्ण प्रथाओं में बदलाव करने की क्षमता रखता है।
‘पितृसत्ता का विरोध किसी एक धर्म तक सीमित नहीं होना चाहिए’
बृजेश सिंह ने अपने लेख में कहा कि यदि ‘पितृसत्ता को खत्म करना’ वास्तव में एक सिद्धांत है, तो इसका दायरा किसी एक धार्मिक समुदाय तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि वे भी समानता, स्वायत्तता, विवाह, तलाक, विरासत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों की उतनी ही हकदार हैं।
उन्होंने शाह बानो प्रकरण का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने धर्मनिरपेक्ष आपराधिक प्रक्रिया कानून के तहत शाह बानो के गुजारा-भत्ते के अधिकार का समर्थन किया था। इसके बाद राजनीतिक और धार्मिक विरोध के बीच तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने वर्ष 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम बनाया। बृजेश सिंह ने इसे महिला अधिकारों और राजनीतिक फैसलों के बीच मौजूद विरोधाभास के उदाहरण के तौर पर पेश किया।
‘महिलाओं के अधिकारों पर सिद्धांत आधारित रुख जरूरी’
बृजेश सिंह ने कहा कि किसी महिला के अधिकारों को उसके धर्म के आधार पर अलग-अलग नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, अगर पितृसत्ता का विरोध करना है तो सभी समुदायों में महिलाओं की समानता, स्वतंत्रता और सम्मान के लिए आवाज उठानी होगी।
उन्होंने कहा कि एक सच्चा नेता महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में सिद्धांत आधारित रुख अपनाता है, भले ही वह राजनीतिक रूप से कठिन या नुकसानदेह क्यों न हो। बृजेश सिंह ने अपने लेख के अंत में कहा कि पितृसत्ता को किसी अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर मौजूद होने के आधार पर छूट नहीं दी जा सकती और महिलाओं के अधिकार सभी के लिए समान होने चाहिए।
उनका यह लेख राहुल गांधी के ‘पितृसत्ता को खत्म करने’ वाले बयान पर सीधे राजनीतिक सवाल खड़ा करता है और महिला अधिकारों के मुद्दे पर समान मानदंड अपनाने की मांग करता है।




