मौनी अमावस्या के अवसर पर प्रयागराज में संगम स्नान के दौरान ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों के साथ कथित बदसलूकी और मारपीट का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। शंकराचार्य के शिष्यों और बटुकों ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिनमें शारीरिक उत्पीड़न, अपमान और जबरन हिरासत में लेकर मारपीट का दावा किया गया है।
घटना के प्रत्यक्षदर्शी शिष्यों के अनुसार, पुलिस ने शंकराचार्य का राजदंड छीन लिया और बटुकों की शिखा पकड़कर उन्हें घसीटा गया। आरोप है कि कई शिष्यों को एक कमरे में बंद कर कपड़े उतरवाने के बाद हाथों और लातों से पीटा गया। शिष्यों का दावा है कि इस घटना में कुल 15 लोग घायल हुए हैं, जिनमें से तीन की हालत गंभीर बताई जा रही है। घायलों को स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
शंकराचार्य के एक शिष्य ने बताया कि वे किसी वीआईपी सुविधा की मांग नहीं कर रहे थे, बल्कि आम श्रद्धालुओं की तरह ही संगम स्नान करना चाहते थे। उनका कहना है कि पालकी ले जाने का उद्देश्य केवल भीड़ में अव्यवस्था और भगदड़ से बचाव था, ताकि ऊंचाई से दर्शन हो सकें और मार्ग स्पष्ट रहे। शिष्यों का यह भी कहना है कि उन्होंने कार्यक्रम की सूचना तीन दिन पहले ही प्रशासन को पत्र के माध्यम से दे दी थी।
संतों ने प्रशासन पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि अन्य अखाड़ों और तथाकथित वीआईपी संतों को गाड़ियों और हथियारों के साथ जाने दिया गया, जबकि शंकराचार्य को जानबूझकर रोका गया। शिष्यों का आरोप है कि गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने की मांग उठाने के कारण उन्हें निशाना बनाया गया।
इस पूरे मामले पर प्रयागराज प्रशासन का कहना है कि बिना अनुमति पालकी ले जाने के कारण और भीड़ नियंत्रण के उद्देश्य से शंकराचार्य को रोका गया था। पुलिस प्रशासन ने मारपीट के आरोपों की जांच कराने की बात कही है। वहीं, शिष्यों ने एक पुलिस अधिकारी पर अपमानजनक टिप्पणी करने का भी आरोप लगाया है। शिष्यों के अनुसार, अधिकारी ने कहा, “यह डंडा-वंडा फेंक दो, यह भेष-भूषा किसी काम नहीं आएगी, जाओ पढ़ो-लिखो और डॉक्टर बनो।”
फिलहाल, मामले की जांच की बात कही जा रही है, जबकि शंकराचार्य के शिष्य और संत समाज निष्पक्ष कार्रवाई की मांग पर अड़े हुए हैं।





