प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य पद को लेकर विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। ज्योतिर्मठ से जुड़े शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच तनातनी और तेज हो गई है। ताजा घटनाक्रम में प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को औपचारिक नोटिस जारी कर 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा है।
नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले का हवाला देते हुए पूछा गया है कि जब ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद पर नियुक्ति को लेकर न्यायालय की रोक लगी है, तो वह स्वयं को शंकराचार्य क्यों बता रहे हैं। यह नोटिस प्रयागराज मेला प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की ओर से जारी किया गया है।
मौनी अमावस्या की घटना के बाद बढ़ा विवाद
यह विवाद उस घटना के बाद और गहरा गया, जब मौनी अमावस्या के दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके अनुयायियों को कथित तौर पर गंगा स्नान से रोके जाने का आरोप लगा। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि इस दौरान पुलिस द्वारा उनके साथ मारपीट भी की गई। इसके विरोध में उन्होंने अपने शिविर के बाहर अन्न-जल त्याग कर प्रदर्शन शुरू कर दिया और मेला प्रशासन व पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से सार्वजनिक माफी की मांग की।
नोटिस में क्या कहा गया है
मेला प्रशासन के नोटिस के अनुसार, ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील संख्या 3011/2020 विचाराधीन है। यह मामला ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती से जुड़ा हुआ है। अदालत के अंतिम निर्णय या किसी नए आदेश तक इस पद पर किसी भी प्रकार का पट्टाभिषेक या आधिकारिक नियुक्ति नहीं हो सकती।
प्रशासन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद माघ मेला 2025-26 के शिविर में लगाए गए बोर्ड पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्वयं को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य बताया है, जिसे कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना माना जा रहा है।
मेला प्रशासन के नोटिस के अनुसार, ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील संख्या 3011/2020 विचाराधीन है। यह मामला ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती से जुड़ा हुआ है। अदालत के अंतिम निर्णय या किसी नए आदेश तक इस पद पर किसी भी प्रकार का पट्टाभिषेक या आधिकारिक नियुक्ति नहीं हो सकती।
प्रशासन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद माघ मेला 2025-26 के शिविर में लगाए गए बोर्ड पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्वयं को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य बताया है, जिसे कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना माना जा रहा है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पलटवार
नोटिस पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि शंकराचार्य कौन है, इसका निर्णय न तो प्रशासन कर सकता है और न ही कोई संवैधानिक पद। उनके अनुसार, शंकराचार्य की मान्यता अन्य पीठों के शंकराचार्य तय करते हैं। उन्होंने दावा किया कि चार में से दो पीठों के शंकराचार्य उन्हें शंकराचार्य मानते हैं और पूर्व में माघ मेले में उनके साथ स्नान भी कर चुके हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि न तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और न ही भारत के राष्ट्रपति को यह तय करने का अधिकार है कि शंकराचार्य कौन होगा। शंकराचार्य का निर्णय केवल शंकराचार्य ही करते हैं।
पट्टाभिषेक का क्या अर्थ है
नोटिस में जिस ‘पट्टाभिषेक’ शब्द का उल्लेख किया गया है, उसका अर्थ किसी पद पर विधिवत ताजपोशी से है। धार्मिक संदर्भ में, जब किसी संत को किसी पीठ के सर्वोच्च पद पर औपचारिक रूप से स्थापित किया जाता है, तो उसे पट्टाभिषेक कहा जाता है। यही प्रक्रिया किसी व्यक्ति को धार्मिक और कानूनी रूप से उस पद का अधिकारी बनाती है।
फिलहाल मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से स्पष्ट जवाब मांगा है कि न्यायालय की रोक के बावजूद वह अपने नाम के साथ शंकराचार्य पद का उपयोग क्यों कर रहे हैं। अब सभी की नजरें उनके जवाब और आगे की प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं।





