उत्तर प्रदेश में दलित समाज की आबादी करीब 20-21 प्रतिशत है और यह हर चुनाव में निर्णायक शक्ति रखता है। लेकिन सवाल यह है कि राजनीतिक दल इस समुदाय को अपने संगठन और नेतृत्व में कितनी जगह दे रहे हैं।
हाल ही में अलग-अलग पार्टियों ने जिलाध्यक्षों की नियुक्तियां की हैं। आंकड़े बताते हैं कि दलितों का संगठन में प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में सीमित है।
- भाजपा: 95 जिलाध्यक्षों में सिर्फ 9 (10%) दलित हैं। इनमें पासी, कोरी, धोबी और कंठेरिया जैसी जातियों का प्रतिनिधित्व है।
- सपा: लगभग 3 प्रतिशत जिलाध्यक्ष दलित हैं।
- बसपा: दलित राजनीति की सबसे मजबूत पहचान वाली पार्टी। संगठन में सबसे अधिक जाटव समुदाय के नेताओं को स्थान मिला है।
- कांग्रेस: बीपीडीए फार्मूले के तहत संगठन में 19 दलित नेता शामिल हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि दलित समाज आज भी यूपी की राजनीति में निर्णायक वोट बैंक है, लेकिन संगठन और नेतृत्व में उनकी हिस्सेदारी कम है। आने वाले समय में यह तय करेगा कि दलित समाज सिर्फ वोट बैंक बनकर रहेगा या सत्ता और नेतृत्व में अपनी हिस्सेदारी भी मजबूत करेगा।
अगर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की बात करें तो दलित राजनीति की सबसे मजबूत पहचान इसी पार्टी से जुड़ी रही है। बहुजन आंदोलन से निकली बसपा लंबे समय तक दलितों की प्रमुख राजनीतिक आवाज रही है। पार्टी के संगठन में सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व जाटव समुदाय के नेताओं का दिखाई देता है। जाटव दलित समाज का बड़ा हिस्सा हैं और बसपा सुप्रीमो Mayawati भी इसी समुदाय से आती हैं। यही वजह है कि बसपा का संगठन आज भी दलित राजनीति के केंद्र में माना जाता है।
वहीं कांग्रेस ने अपने संगठन में बीपीडीए (ब्राह्मण-पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फार्मूले के जरिए सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश की है। कांग्रेस के जिलाध्यक्षों में 19 दलित नेता शामिल हैं। यानी पार्टी ने दलित प्रतिनिधित्व देने की कोशिश जरूर की है, लेकिन कुल संगठन के अनुपात में यह संख्या अभी भी बहुत बड़ी नहीं कही जा सकती।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में दलित समाज आज भी चुनावी गणित का बेहद अहम हिस्सा है। लेकिन संगठन और नेतृत्व के स्तर पर उनकी हिस्सेदारी अभी भी सीमित दिखाई देती है। यही वजह है कि समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि क्या दलित समाज सिर्फ एक वोट बैंक बनकर रह गया है, या फिर आने वाले समय में वह नेतृत्व और सत्ता के केंद्र में अपनी भूमिका और मजबूत करेगा।
फिलहाल जो आंकड़े सामने आते हैं, उनसे यही संकेत मिलता है कि दलित वोट की अहमियत सभी राजनीतिक दल समझते हैं, लेकिन संगठन में उनकी भागीदारी बढ़ाने की चुनौती अभी भी बनी हुई है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या राजनीतिक दल दलित समाज को सिर्फ चुनावी समर्थन तक सीमित रखते हैं या फिर उन्हें नेतृत्व की मुख्यधारा में भी उतनी ही जगह देते हैं।




