वाराणसी में पद्मश्री श्रीभास चंद्र सुपकार की 25 वर्षीय बेटी वेदमती को जन्मजात बौद्धिक दिव्यांगता के बावजूद प्रमाणपत्र नहीं मिला; 11 जून 2024 को सीएमओ को पत्र के बाद भी टीम घर नहीं पहुंची
उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में एक ऐसी घटना सामने आई है जो सरकारी व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल उठाती है। पद्मश्री सम्मान से नवाजे गए प्रसिद्ध बनारसी हथकरघा कारीगर श्रीभास चंद्र सुपकार की 25 वर्षीय बेटी वेदमती सुपकार जन्म से ही बौद्धिक दिव्यांगता (कॉर्पस कैलोसम की समस्या) से पीड़ित हैं। लेकिन डेढ़ साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद उनका दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी नहीं हो पाया है, जिसके कारण वे सरकारी योजनाओं और लाभों से वंचित हैं।
श्रीभास सुपकार, जिनके पिता जदुनाथ सुपकार भी पद्मश्री प्राप्त कर चुके हैं और जिन्होंने बनारसी साड़ी व हथकरघा को वैश्विक पहचान दिलाई है, अब अपनी बेटी के लिए विभागीय दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। उन्होंने बताया कि दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग में वेदमती का पंजीकरण पहले ही हो चुका है और उन्हें बौद्धिक दिव्यांग के रूप में मान्यता भी मिल चुकी है। इसके बाद भी स्वास्थ्य विभाग प्रमाणपत्र जारी करने की औपचारिकता पूरी नहीं कर रहा।
श्रीभास सुपकार ने 11 जून 2024 को मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि बेटी की गंभीर स्थिति को देखते हुए मेडिकल टीम घर जाकर जांच करे या वीडियो कॉल से सत्यापन कर प्रमाणपत्र जारी कर दे। नियमों के अनुसार गंभीर मामलों में घरेलू जांच या वीडियो सत्यापन की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन पत्र के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। कई बार फॉलो-अप करने पर अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि मामला सीएमओ तक पहुंचा दिया गया है और वे खुद संपर्क करेंगे, लेकिन आज तक कोई फोन या जांच टीम नहीं पहुंची।
वेदमती का जन्म 17 मई 2000 को हुआ था और वे सामान्य वर्ग से हैं। परिवार का कहना है कि प्रमाणपत्र न मिलने से दिव्यांगजन पेंशन, अन्य सरकारी सहायता और योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा। श्रीभास सुपकार ने कहा, “यह सिर्फ मेरी बेटी की समस्या नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों की तस्वीर है जहां सम्मान तो मिल जाता है, लेकिन जरूरत के समय सहायता नहीं मिलती। व्यवस्था में बदलाव की सख्त जरूरत है।”




