लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं एक बार फिर जोर पकड़ने लगी हैं।
हाल ही में Akhilesh Yadav ने बसपा सुप्रीमो Mayawati को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसे सियासी गलियारों में “सॉफ्ट मैसेज” के तौर पर देखा जा रहा है।
मायावती को लेकर अखिलेश का बदला रुख
मुंबई दौरे के दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि वह बहुजन समाज के साथ हमेशा खड़े हैं और मुश्किल समय में मायावती के साथ भी दिखाई देंगे। उन्होंने 2019 के सपा-बसपा गठबंधन को याद करते हुए कहा कि उनका सपना मायावती को प्रधानमंत्री बनाना था।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बयान बसपा के पारंपरिक वोट बैंक को साधने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि 2027 से पहले सपा और बसपा के बीच नई संभावनाएं बन सकती हैं।
दलित वोट बैंक बना सत्ता की कुंजी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। यही वजह है कि सभी प्रमुख दल इस वर्ग को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटे हैं।
सपा का यह नरम रुख जहां बसपा समर्थकों को आकर्षित करने की कोशिश है, वहीं भाजपा और कांग्रेस भी इस वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूत करने में लगी हैं।
राहुल गांधी का ‘कांशीराम कार्ड’
इसी बीच कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने भी दलित राजनीति को साधने के लिए बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने दलित नेता Kanshi Ram को भारत रत्न देने की मांग करते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है।
कांग्रेस की यह रणनीति दलित-मुस्लिम समीकरण को फिर से मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।
भाजपा भी मैदान में सक्रिय
दलित राजनीति की इस दौड़ में भाजपा भी पीछे नहीं है। कांशीराम जयंती के बाद से सत्ताधारी दल ने भी कई कार्यक्रम आयोजित कर दलित समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश तेज कर दी है।
क्या बनेगा नया गठबंधन?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2027 से पहले सपा और बसपा के बीच फिर से गठबंधन होगा या यह केवल राजनीतिक बयानबाजी तक ही सीमित रहेगा।
फिलहाल, इतना तय है कि आने वाले समय में दलित वोट बैंक उत्तर प्रदेश की सत्ता की कुंजी साबित हो सकता है और सभी दल इस पर अपनी पकड़ मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।




