देशभर में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर माहौल लगातार गर्म बना हुआ है। छात्र संगठनों से लेकर राजनीतिक दलों तक, हर स्तर पर विरोध और बहस देखने को मिल रही है। सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, मामला अदालत तक पहुंच चुका है और राजनीतिक हलकों में भी इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। ऐसे में समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav के रुख को लेकर लंबे समय से कयास लगाए जा रहे थे।
अब इस सस्पेंस पर विराम लग गया है। यूजीसी के नए नियमों को लेकर अखिलेश यादव की पहली प्रतिक्रिया सामने आई है, जिसमें उन्होंने किसी एक पक्ष में खड़े होने के बजाय संतुलन और न्याय की बात कही है। अखिलेश यादव ने कहा, “दोषी बचना नहीं चाहिए, लेकिन किसी निर्दोष के साथ अन्याय भी नहीं होना चाहिए।” उनके इस बयान को कानून के सम्मान और न्याय की मूल भावना के तौर पर देखा जा रहा है।
अखिलेश यादव का यह बयान न तो भावनात्मक अपील है और न ही किसी खास वर्ग के पक्ष में खुला समर्थन। इसमें साफ तौर पर यह संकेत मिलता है कि वह सिस्टम के साथ खड़े हैं, लेकिन अंध समर्थन से दूरी बनाए हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह रुख उन्हें इस पूरे विवाद में एक संतुलित और परिपक्व नेता के तौर पर पेश करता है।
दरअसल, यूजीसी के नए नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों और कई संगठनों में नाराज़गी है। उनका कहना है कि ये प्रावधान उनके हितों के खिलाफ हैं। विरोध इतना बढ़ गया कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है, हालांकि सुनवाई की तारीख को लेकर अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
राजनीतिक असर की बात करें तो विरोध की आंच सत्ताधारी दल तक भी पहुंचती दिख रही है। अलग-अलग जिलों से भारतीय जनता पार्टी के कुछ पदाधिकारियों के इस्तीफों की खबरें सामने आई हैं। वहीं बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट के इस्तीफे ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है।
सरकार और यूजीसी की ओर से यह भरोसा दिलाया गया है कि किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। अधिकारियों का कहना है कि सभी पक्षों से बातचीत के लिए 15 दिन का समय लिया जाएगा, ताकि भ्रम दूर हो सके और आपत्तियों पर विचार किया जा सके। इसके बावजूद विरोध और समर्थन के बीच खाई फिलहाल बनी हुई है।
इस विवाद की एक अहम सच्चाई यह भी है कि यूजीसी 2026 के नोटिफिकेशन को देश की बड़ी आबादी ने न तो पूरा पढ़ा है और न ही गहराई से समझा है। ज़्यादातर लोगों की जानकारी सोशल मीडिया पोस्ट, छोटे वीडियो और टिप्पणियों तक सीमित है। यही वजह है कि यह मुद्दा दो स्पष्ट ध्रुवों में बंटता नज़र आ रहा है—या पूरी तरह समर्थन, या पूरी तरह विरोध।
ऐसे माहौल में अखिलेश यादव का बयान इस ओर इशारा करता है कि राजनीति अगर तर्क और न्याय के साथ खड़ी हो, तो समाधान की राह निकल सकती है। अब ज़िम्मेदारी सरकार, यूजीसी और समाज—तीनों की है कि संवाद के ज़रिये भ्रम दूर करें, खामियों पर खुले मन से चर्चा करें और यह सुनिश्चित करें कि नियम सख्त हों, लेकिन इंसाफ़ से समझौता न हो।




