उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस से इस्तीफा दे चुके पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के अगले राजनीतिक कदम को लेकर चर्चाएं तेज हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि वे समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं, हालांकि फिलहाल उन्होंने इस पर कोई अंतिम फैसला सार्वजनिक नहीं किया है।
शुक्रवार को एक निजी मीडिया संस्थान से बातचीत में नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि बीते करीब पांच वर्षों से उनका मन असमंजस में था। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगले दो दिनों के भीतर वे अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर स्थिति साफ करेंगे।
समाजवादी पार्टी में शामिल होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि फिलहाल वे अपने समर्थकों, कार्यकर्ताओं और राजनीतिक रणनीतिकारों से बातचीत कर रहे हैं। यदि विचारों में सामंजस्य बनता है, तो समाजवादी पार्टी में जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस से इस्तीफे को लेकर दिए गए अपने लिखित बयान में नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि वे व्यक्तिगत और अपरिहार्य कारणों के चलते पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और सभी संगठनात्मक जिम्मेदारियों से अलग हो रहे हैं। उन्होंने यह भी साफ किया कि कांग्रेस के किसी पदाधिकारी के खिलाफ उनकी कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है।
उन्होंने बताया कि करीब आठ साल पहले वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए थे और हमेशा जमीनी स्तर पर काम करने को अपनी राजनीति की पहचान मानते रहे हैं। उनका कहना है कि त्योहारों से लेकर सामाजिक गतिविधियों तक, वे अक्सर गांव-देहात में लोगों के बीच मौजूद रहे। लेकिन बीते कुछ वर्षों में उन्हें यह महसूस हुआ कि उनके अनुभव और क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा था। सिद्दीकी के शब्दों में, जहां विचारों की स्वतंत्रता न हो, वहां से अलग हो जाना ही बेहतर विकल्प होता है।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का राजनीतिक आधार बुंदेलखंड के बांदा ज़िले से रहा है। यह इलाका जातिगत संतुलन और स्थानीय मुद्दों की राजनीति के लिए जाना जाता है, जहां कुर्मी, ब्राह्मण, पिछड़ा वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं की भूमिका निर्णायक मानी जाती है। पानी की कमी, रोजगार, पलायन, कृषि संकट और बुनियादी सुविधाएं लंबे समय से यहां के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, बुंदेलखंड में वही नेता स्वीकार्य होता है जो लगातार जमीन पर सक्रिय दिखे, और इसी वजह से सिद्दीकी की पहचान एक ग्रासरूट नेता के रूप में बनी रही है।
उनका राजनीतिक सफर बसपा के संस्थापक कांशीराम के दौर में शुरू हुआ। 1988 में उन्होंने राजनीति में कदम रखा और उसी वर्ष बहुजन समाज पार्टी से जुड़े। 1991 में उन्हें चुनावी सफलता मिली, जबकि 1993 में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन संगठन में उनका प्रभाव लगातार बढ़ता गया।
2007 में जब मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी ने सत्ता हासिल की, तब नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी के भरोसेमंद नेताओं में गिना जाता था। हालांकि 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप लगे और उन्हें बहुजन समाज पार्टी से बाहर कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मायावती पर गंभीर आरोप लगाए और एक ऑडियो टेप भी सार्वजनिक किया। इसी राजनीतिक टकराव के बाद उन्होंने कांग्रेस का रुख किया।
कांग्रेस में रहते हुए सिद्दीकी की पहचान उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख मुस्लिम नेता के तौर पर बनी, लेकिन अब उन्होंने साफ किया है कि जिन उद्देश्यों के साथ वे पार्टी में आए थे, वे पूरे नहीं हो सके।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब प्रदेश की राजनीति 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है और नए सामाजिक व क्षेत्रीय समीकरण बनते दिख रहे हैं। ऐसे में नसीमुद्दीन सिद्दीकी के सामने अपने राजनीतिक रोल को नए सिरे से तय करने का अवसर है।
फिलहाल स्थिति यही है कि कांग्रेस से इस्तीफे के कारणों पर उनका पक्ष स्पष्ट है, जबकि समाजवादी पार्टी को लेकर उन्होंने केवल संभावना जताई है। औपचारिक ऐलान होने तक उनके अगले कदम को राजनीतिक आकलन के तौर पर ही देखा जाएगा। इतना तय है कि उनका फैसला, जो भी होगा, उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल जरूर पैदा करेगा।




