देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू किए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ को लेकर विवाद तेज हो गया है। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में जहां सामान्य वर्ग के छात्र और संगठन इन नियमों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती ने इस मुद्दे पर अपनी स्पष्ट और सख्त प्रतिक्रिया दी है।
मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर तीन अहम बिंदुओं में अपनी बात रखते हुए न सिर्फ नए नियमों का समर्थन किया, बल्कि इनके विरोध को लेकर भी तीखे सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए बनाए जा रहे इक्विटी ढांचे का विरोध करना दुर्भाग्यपूर्ण है।
UGC द्वारा 13 जनवरी को अधिसूचित ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी नियम, 2026’ के तहत अब सभी सरकारी कॉलेजों और निजी
विश्वविद्यालयों में इक्विटी कमेटी (समता समिति) का गठन अनिवार्य होगा। ये नियम वर्ष 2012 के पुराने प्रावधानों की जगह लेंगे।
मायावती ने अपने पहले बिंदु में कहा कि इक्विटी कमेटी का विरोध करने वाले लोग इसे अपने खिलाफ साजिश के तौर पर देख रहे हैं, जो एक संकीर्ण और जातिवादी सोच को दर्शाता है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ऐसे विरोध से सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचता है।
दूसरे बिंदु में BSP प्रमुख ने सरकार की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि ऐसे संवेदनशील नियमों को लागू करने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में लिया जाता, तो बेहतर होता। उन्होंने चेताया कि संवाद के अभाव में लिए गए फैसले सामाजिक तनाव बढ़ा सकते हैं, जिस पर सरकार और संस्थानों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
तीसरे बिंदु में मायावती ने दलितों और पिछड़े वर्गों से अपील की कि वे अपने ही समाज के स्वार्थी और अवसरवादी नेताओं के भड़काऊ बयानों से सावधान रहें। उन्होंने कहा कि कुछ नेता केवल अपनी राजनीति चमकाने के लिए इन वर्गों का इस्तेमाल करते हैं।
इस बीच, नियमों के विरोध को लेकर सरकार की ओर से भी सफाई दी गई है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि नए ढांचे के तहत किसी भी छात्र या वर्ग का उत्पीड़न नहीं किया जाएगा। उनका कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य केवल उच्च शिक्षा में समानता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना है, न कि किसी के साथ भेदभाव।
UGC के इन नए प्रावधानों को लेकर जहां छात्र संगठनों और सामान्य वर्ग के समूहों में असमंजस और नाराजगी बनी हुई है, वहीं मायावती के बयान के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।





