उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए एक और बड़ा झटका सामने आया है। पार्टी के पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्रांतीय अध्यक्ष और प्रमुख मुस्लिम नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। यह इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और कांग्रेस यूपी में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। सिद्दीकी, जो कभी मायावती के सबसे करीबी सहयोगी थे और बसपा में मंत्री रह चुके हैं, कांग्रेस में मुस्लिम वोट बैंक को साधने के प्रमुख चेहरे माने जाते थे।
इस्तीफे की वजह क्या?
दोपहर करीब 12 बजे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को अपना इस्तीफा सौंपा। इस्तीफे में उन्होंने पार्टी में लगातार उपेक्षा, मुस्लिम नेताओं की अनदेखी और पश्चिमी यूपी में संगठन को मजबूत करने में नेतृत्व की नाकामी का जिक्र किया है। सिद्दीकी ने स्पष्ट आरोप लगाया कि कांग्रेस उन्हें सिर्फ “मुस्लिम चेहरा” बनाकर इस्तेमाल कर रही थी, लेकिन वास्तविक जिम्मेदारी, सम्मान या पावर नहीं दी गई।
पिछले कुछ महीनों से सिद्दीकी नाराज चल रहे थे। 2024 लोकसभा चुनाव में उन्हें टिकट नहीं मिला, जबकि पार्टी उन्हें मुस्लिम बहुल सीटों पर बड़ा दांव मान रही थी। प्रांतीय अध्यक्ष का पद तो मिला, लेकिन कोई वास्तविक अधिकार या संसाधन नहीं। सूत्रों के मुताबिक, यह इस्तीफा पार्टी की मुस्लिम राजनीति पर गहरा प्रहार है, क्योंकि सिद्दीकी की सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ और आसपास के इलाकों में मजबूत पकड़ है।
राजनीतिक सफर: बसपा से कांग्रेस तक का सफर
नसीमुद्दीन सिद्दीकी की राजनीति की शुरुआत 1980-90 के दशक में बसपा से हुई। वे बांदा से कई बार विधायक चुने गए। मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे – गन्ना विकास, पशुपालन, खाद्य एवं रसद जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले। बसपा में वे मायावती के बाद नंबर-2 की पोजीशन पर थे और मुस्लिम समाज में बड़े चेहरे माने जाते थे।
2017 में बसपा की हार के बाद मायावती ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया। आरोप लगे – पार्टी फंड हड़पने और एंटी-पार्टी एक्टिविटी के। सिद्दीकी ने पलटवार किया और मायावती पर गंभीर आरोप लगाए। 2018 में वे कांग्रेस में शामिल हुए, जहां राहुल गांधी और गुलाम नबी आजाद ने उन्हें खुला स्वागत किया। कांग्रेस ने उन्हें मुस्लिम वोट बसपा और सपा से छीनने का हथियार बनाया। पश्चिमी यूपी का प्रांतीय अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन अब लगता है कि पार्टी में भी वे खुद को साइडलाइन महसूस कर रहे थे।
कांग्रेस पर क्या असर?
यह इस्तीफा कांग्रेस के लिए बड़ा सेटबैक है। यूपी में मुस्लिम वोट बैंक पहले से ही सपा और बसपा के बीच बंटा हुआ है। सिद्दीकी जैसे नेता के जाने से पश्चिमी यूपी में पार्टी की मुस्लिम पहुंच कमजोर हो सकती है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या सिद्दीकी अब नई पार्टी बनाएंगे, किसी अन्य दल (जैसे सपा या बसपा) में जाएंगे, या निर्दलीय/नए गठबंधन की राह चुनेंगे?
फिलहाल सिद्दीकी ने आगे के कदमों पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यह कदम 2027 के चुनावों से पहले विपक्षी एकता या नई रणनीति का संकेत हो सकता है। कांग्रेस अब इस नुकसान से कैसे उबरती है, यह देखना दिलचस्प होगा।




