मेरठ: कपसाड़ गांव में पुलिस की ‘तानाशाही’, कवरेज करने पहुंचे पत्रकारों से मारपीट और धक्का-मुक्की!

मेरठ: सरधना के कपसाड़ गांव में दलित महिला की हत्या और बेटी के अपहरण के बाद उपजा तनाव अब पुलिस और मीडिया के बीच टकराव में बदल गया है। गांव को छावनी में तब्दील करने के बाद पुलिस पर आरोप है कि उन्होंने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया को कवरेज से रोकने के लिए अभद्रता और मारपीट का सहारा लिया।

ग्राउंड जीरो पर पत्रकारों से बदसलूकी

मिली जानकारी के अनुसार, एक निजी इलेक्ट्रॉनिक चैनल के संवाददाता जब पीड़ित परिवार का हाल जानने और वहां मौजूद नेताओं से बात करने के लिए गांव पहुंचे, तो पुलिसकर्मियों ने उन्हें जबरन रोक लिया।

  • मारपीट का आरोप: मीडियाकर्मी का आरोप है कि जब उन्होंने कवरेज से रोके जाने का विरोध किया, तो तैनात पुलिसकर्मियों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और मारपीट पर उतारू हो गए।
  • चुप कराने की कोशिश: पत्रकारों का आरोप है कि प्रशासन गांव के हालातों को छिपाने के लिए मीडिया की आवाज दबाना चाहता है।

गांव सील, पगडंडियों के सहारे पहुंचे रिपोर्टर

पुलिस ने कपसाड़ गांव की ऐसी घेराबंदी की है कि मुख्य रास्तों से परिंदा भी पर नहीं मार सकता।मीडिया और राजनीतिक नेताओं के प्रवेश पर लगभग पूरी तरह रोक लगा दी गई है।कई पत्रकार खेतों और पगडंडियों के रास्ते जान जोखिम में डालकर गांव के अंदर पहुंचने को मजबूर हैं। सलावा चौराहे और अटेरना पुल पर की गई बैरिकेडिंग के कारण कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया है, जिससे राहगीर और आम जनता घंटों से परेशान है।

    लोकतंत्र के मूल्यों पर प्रहार

    इस घटना के बाद मेरठ के पत्रकारों में भारी आक्रोश है। स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि पुलिस का यह रवैया न केवल निंदनीय है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के भी खिलाफ है। पत्रकारों के संगठनों ने इस मामले की शिकायत वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और शासन से करने की तैयारी कर ली है।

    आम जनता बेहाल, घंटों फंसी रहीं गाड़ियां

    बैरिकेडिंग का खामियाजा आम राहगीरों को भुगतना पड़ रहा है। सलावा चौराहे पर लगे जाम में फंसे यात्रियों ने बताया कि उन्हें जरूरी कामों के लिए जाना था, लेकिन पुलिस ने न केवल रास्ता रोका बल्कि ई-रिक्शा और निजी वाहनों को जबरन वापस भेज दिया।

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