उत्तर प्रदेश की 69,000 सहायक शिक्षक भर्ती एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस के केंद्र में आ गई है। भर्ती में आरक्षण नियमों के कथित उल्लंघन को लेकर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का आंदोलन लगातार तेज़ होता जा रहा है। अभ्यर्थियों का कहना है कि यह मामला केवल नौकरी का नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ है। इसी विवाद से जुड़े मामले पर आज, 4 फरवरी को Supreme Court of India में सुनवाई होनी है, जिस पर हज़ारों अभ्यर्थियों की निगाहें टिकी हुई हैं।उत्तर प्रदेश की 69,000 सहायक शिक्षक भर्ती एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस के केंद्र में आ गई है। भर्ती में आरक्षण नियमों के कथित उल्लंघन को लेकर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का आंदोलन लगातार तेज़ होता जा रहा है। अभ्यर्थियों का कहना है कि यह मामला केवल नौकरी का नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ है। इसी विवाद से जुड़े मामले पर आज, 4 फरवरी को Supreme Court of India में सुनवाई होनी है, जिस पर हज़ारों अभ्यर्थियों की निगाहें टिकी हुई हैं।
भर्ती की शुरुआत और विवाद की पृष्ठभूमि
69,000 सहायक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया की शुरुआत वर्ष 2018 में हुई थी। इसकी पहली विज्ञप्ति दिसंबर 2018 में जारी की गई थी। यह भर्ती उत्तर प्रदेश के परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी को पूरा करने के उद्देश्य से लाई गई थी। चयन प्रक्रिया वर्ष 2019 में पूरी हुई और चरणबद्ध तरीके से नियुक्तियां की गईं। हालांकि, चयन के बाद ही आरक्षण की गणना को लेकर विवाद सामने आया।
69,000 सहायक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया की शुरुआत वर्ष 2018 में हुई थी। इसकी पहली विज्ञप्ति दिसंबर 2018 में जारी की गई थी। यह भर्ती उत्तर प्रदेश के परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी को पूरा करने के उद्देश्य से लाई गई थी। चयन प्रक्रिया वर्ष 2019 में पूरी हुई और चरणबद्ध तरीके से नियुक्तियां की गईं। हालांकि, चयन के बाद ही आरक्षण की गणना को लेकर विवाद सामने आया।
आरक्षित वर्ग के आरोप
आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का आरोप है कि भर्ती में आरक्षण नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। उनका कहना है कि ओबीसी और अनुसूचित जाति वर्ग को तय प्रतिशत के अनुसार आरक्षण का लाभ नहीं मिला, जिससे बड़ी संख्या में योग्य अभ्यर्थी चयन से बाहर रह गए। इसी मुद्दे को लेकर मामला पहले Allahabad High Court पहुंचा, जहां एक आदेश आरक्षित वर्ग के पक्ष में आया। इसके बाद राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इस केस की पिछली सुनवाई सितंबर 2024 में हुई थी और अब आज इस पर दोबारा सुनवाई होनी है।
आंदोलन और लखनऊ का प्रदर्शन
सुनवाई से पहले आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का आंदोलन और तेज़ हो गया है। 2 फरवरी को अभ्यर्थियों ने Lucknow में प्रदर्शन किया। इस दौरान “केशव चाचा न्याय करो” के नारे लगाए गए। स्थिति को देखते हुए मौके पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया और प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों को बसों के माध्यम से इको गार्डन धरना स्थल भेजा गया।
प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों का कहना है कि इससे पहले भी कई बार उपमुख्यमंत्री Keshav Prasad Maurya के आवास का घेराव किया गया था। उस दौरान उन्हें त्वरित न्याय का आश्वासन मिला, लेकिन अभ्यर्थियों का आरोप है कि अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसी कारण पिछड़े, दलित और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के अभ्यर्थियों में गहरी निराशा है और वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
सरकार का पक्ष
वहीं, राज्य सरकार और बेसिक शिक्षा विभाग का कहना है कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है। सरकार के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। विभाग का यह भी दावा है कि भर्ती प्रक्रिया में किसी प्रकार का जानबूझकर नियम उल्लंघन नहीं किया गया और अंतिम फैसला अदालत के निर्देश के बाद ही लिया जाएगा।
69,000 सहायक शिक्षक भर्ती का मामला अब केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है। यह राजनीतिक आश्वासनों, कानूनी व्याख्याओं और सामाजिक न्याय से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। आज सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकता है कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को राहत मिलती है या उन्हें आगे भी लंबे इंतज़ार और आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा। फिलहाल, सभी की निगाहें अदालत के फैसले और सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।




