श्रीलंका ने तोड़ी चुप्पी, ये मामला तो ’50 साल पहले’ सुलझा लिया

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चित्र : श्रीलंका के विदेश मंत्री अली साबरी।

कोलंबो। भारत में चल रहे कच्चातीवु मामले पर श्रीलंका ने अपनी पहली प्रतिक्रिया जारी की है। श्रीलंका का कहना है कि यह मामला 50 साल पहले ही सुलझा लिया गया है। श्रीलंका के विदेश मंत्री अली साबरी ने यह बात कही है, और कहा है कि दोबारा विचार करने की कोई जरूरत नहीं है।

इफ्तार रात्रिभोज में बोलते हुए विदेश मंत्री ने कहा, इस मामले में कोई विवाद नहीं है, ये एक आंतरिक राजनीतिक बहस कर रहे हैं। साबरी का यह बयान पीएम मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर के श्रीलंका में दिए गए बयानों के बाद, आया है, और यह उनका ऑफिशियल स्टेटमेंट है।

बता दें कि कच्चातीवु द्वीप विवाद के बारे में कच्चातीवु द्वीप, रामेश्वरम (भारत) और श्रीलंका के बीच स्थित है, जिसका इस्तेमाल पारंपरिक रूप से श्रीलंकाई और भारतीय मछुआरे दोनों करते थे। तमिलनाडु बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई द्वारा आरटीआई आवेदन के जरिए से प्राप्त दस्तावेजों से पता चला है कि श्रीलंका भारतीय तट से लगभग 20 किलोमीटर दूर 1.9 वर्ग किलोमीटर भूमि पर दावा करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। अपने छोटे आकार के बावजूद, श्रीलंका ने इस दावे को दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ाया, जबकि नई दिल्ली ने दशकों तक इसका विरोध किया, अंततः उसे इसे स्वीकार करना पड़ा।

श्रीलंका, जो तब सीलोन था, ने स्वतंत्रता के तुरंत बाद अपना दावा पेश किया, जिसमें कहा गया कि भारतीय नौसेना (तब रॉयल इंडियन नेवी) उसकी अनुमति के बिना द्वीप पर अभ्यास नहीं कर सकती। अक्टूबर 1955 में, सीलोन वायु सेना ने द्वीप पर अपना अभ्यास किया।

रिपोर्ट में इस मुद्दे पर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की टिप्पणियों का भी हवाला दिया गया है, जो भारत और लंका के बीच विवाद का एक स्रोत है, कि उन्हें द्वीप पर दावा छोड़ने में कोई हिचकिचाहट नहीं होगी। 1974 में, तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने ‘भारत-श्रीलंका समुद्री समझौते’ के तहत कच्चातीवु को श्रीलंकाई क्षेत्र के रूप में स्वीकार किया। पाक जलडमरूमध्य और पाक खाड़ी में श्रीलंका और भारत के बीच ऐतिहासिक जल के बारे में 1974 के समझौते ने औपचारिक रूप से द्वीप पर श्रीलंका की संप्रभुता की पुष्टि की।

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