सामाजिक न्याय के ऐसे पुरोधा, जिनकी सियासी विरासत के लिए राजनीतिक दलों मे लगी होड़

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सामाजिक न्याय
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इस साल के अंत मे बिहार में विधानसभा के चुनाव होने हैं, जिसको लेकर सभी दल अभी से बिहार को साधने की जुगत मे लग गए है, सभी दल कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) की सियासत का खुद को हक़दार बताते है|

एक तरफ जहां सांसद, विधायक बनते ही रुपया पैसा घर गाड़ी जागीर बन जाती है तो वहीं दूसरी तरफ कर्पूरी ठाकुर का जीवन सरलता सहजता और ईमानदारी का प्रतीक था।

सन् 1924 में बिहार के समस्तीपुर में उनका जन्म हुआ था तथा बचपन से ही कर्पूरी शिक्षा मे तेज थे, 1940 मे उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी (First Division) से पास की थी ये बात ज़ब उन्होंने अपने पिता को बताई तो उनके पिता बहुत खुश हुए और कर्पूरी को आगे पढ़ाने का प्रण लिया, लेकिन परिवार की माली स्थिति बेहतर नहीं थी कहा जाता है कर्पूरी को आगे पढ़ाने के लिए उनके पिता उन्हें लेकर जमींदार के घर गए और मदद मांगी पर जमींदार ने उन्हें दुत्कार दिया। इस घटना ने कर्पूरी ठाकुर के मन मे घर कर दिया और पढ़ लिखकर कर्पूरी अपने गाँव के ही विद्यालय में शिक्षक बन गए।

ये वही समय था जब देश मे आजादी के आंदोलन तेज हो रहे थे और इस आंदोलन से कर्पूरी कैसे पीछे रहते, जिसके बाद वो जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और आचार्य नरेंद्र देव की संगत में आए और धीरे-धीरे समजवादी विचारों से जुड़ने लगे।
आजादी के बाद पहला आम चुनाव 1952 मे विधानसभा का चुनाव लड़े और जीत गए।
1967 में पहली बार गैर कांग्रेसवाद की बयार बिहार मे चली तब महामाया प्रसाद सिन्हा बिहार के मुख्यमंत्री बने तो वहीं कर्पूरी ठाकुर इसी सरकार में उप मुख्यमंत्री बने।

कर्पूरी ठाकुर नें अपने कार्यकाल मे शिक्षा को आम लोगों के लिए सरल व सहज बनाया जिससे हाशिये पर खड़े समाज का उत्थान हुआ।

1967 से 1980 के दशक तक बिहार की सियासत में काफी अस्थिरता दिखी। इसी बीच कर्पूरी ठाकुर बिहार के दो बार मुख्यमंत्री रहे,
कर्पूरी ठाकुर अपने जीवन मे करीब 20बार जेल गए।
जननायक कर्पूरी ठाकुर एक ऐसे समाजवादी नेता थे जिनकी सादगी का लोहा उनके विरोधी भी मानते थे।
उन्होंने कहा था ‘हक़ चाहिए तो लड़ना सीखो, जीना है तो मरना सीखो’
सादगी के पुरोधा कर्पूरी लोकराज की स्थापना के पैरोकार थे,
गरीबो के हक़ और हकूक़ के सच्चे सिपाही कर्पूरी ठाकुर की मृत्यु 1988 मे हो गई।
कहा जाता है ठाकुर के अंतिम संस्कार के जुलूस के पास जाने से रोकी गई एक बूढ़ी महिला ने एसपी पर हमला करते हुए कहा, “तुम्हें क्या है, हमारा बेटा मरा है।”

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