आजादी के बाद Bihar मे बदलती सियासत का स्वरूप | ‘ई बा बिहार’ | Ee Ba Bihar | Episode – 1

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भारत मे बिहार का इतिहास विविधताओं से भरा हुआ है, प्राचीन बिहार, जो कि मगध के रूप में जाना जाता था, बिहार1000 वर्षो तक जो प्रमुख रूप से शिक्षा और संस्कृति, का केंद्र रहा, भारत के पहले साम्राज्य, मौर्य साम्राज्य के साथ ही दुनिया की सबसे बड़ी शांतिवादी धर्म बौद्ध धर्म की शुरुआत बिहार से हुई।  

कालांतर से ही बिहार शिक्षा व साहित्य का प्रमुख केंद्र था, आज बिहार राजनैतिक रूप से भी काफ़ी उर्वरा भूमि है, बिहार के राजनीतिक सफर की बात करें तो आजादी के बाद जब पहला चुनाव हुआ तो कांग्रेस के डॉ. श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पहले मुख्यमंत्री बने, आज बिहार केन्द्रीय राजनीति का प्रमुख हिस्सा बन चुका है हालांकि, आजादी के बाद के पहले तीन दशकों में जब कांग्रेस उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में एक प्रमुख राजनैतिक ताकत थी, तब धीरे धीरे अन्य दल भी जमीन पर संघर्ष के सहारे सक्रिय हो रहे थे.

बिहार के राजनैतिक खंड काल को 4 हिस्सों मे अगर बांटा जाये तो, बिहार की सत्ता पर कांग्रेस ने लंबे समय तक राज किया है, लेकिन वक्त बदला और राजनीति ने ऐसी करवट ली कि आज कांग्रेस बैसाखी के सहारे चुनावी मैदान में है. आजादी के बाद से लेकर 1990 तक कांग्रेस बिहार की सत्ता में आती और जाती रही है, लेकिन मंडल की सियासत ने कांग्रेस की जमीन को बंजर बना दिया. इसके बाद से वो दोबारा से सत्ता में वापसी नहीं कर रही है. 1952 से लेकर 2015 तक बिहार में कुल 23 मुख्यमंत्री बने हैं, जिनमें से 18 कांग्रेस के रहे हैं. कांग्रेस के जितने भी मुख्यमंत्री बने हैं, उनमें से महज एक ही सीएम पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सका है बाकी नहीं.

समय के पहिये को थोड़ा पीछे लेकर चलते है
18 मार्च 1974 को जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में पटना में छात्र आंदोलन की शुरूआत हुई थी. जो देश भर में जेपी आंदोलन के रूप में जाना गया. इस आंदोलन के चलते ही देश को लोकतंत्र का सबसे काला समय यानी ‘आपातकाल’ का सामना करना पड़ा. इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने वाले नेताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक को जेल में डाल दिया गया था. जेलों में जगह नहीं बची थी, लेकिन आपातकाल के विरोध में आवाज बुलंद करने वालों के हौसले बचे हुए थे और उन्होंने इस काम को बखूबी किया है. इसी का नतीजा था कि 21 महीने के बाद 21 मार्च 1977 को देश से आपातकाल हटा लिया गया.

देश की जनता ने कुछ ही महीनों के बाद वोट देने की अपनी ताकत से इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया, उसके बाद बिहार की राजनीति मे लालू यादव एक नई सोच और नए तेवर के साथ आए जिनको नीतीश का भी साथ मिला और राम विलास पासवन का भी ये तीनो नेता जेपी के शिष्य थे

साल 2005 को बिहार की राजनीति का आधार वर्ष कहा जा सकता है. ये वही साल था जब बिहार की राजनीति एक धारा से दूसरी धारा की ओर चल पड़ी, बिहार की राजनीति में लालू-राबड़ी युग के बाद नीतीश कुमार का पदार्पण हुआ.
इस चुनाव में लालू के पारंपरिक वोट बैक यादवों में लालू के प्रति उदासीनता दिखी. लालू की शख्सियत के इर्द-गिर्द लड़ गए इस चुनाव को यादव मतदाता चौथी बार स्वीकार कर नहीं पा रहा था. 1990, 1995, 2000 में लालू इस जाति के जुड़ाव की भावनात्म फसल को काट चुके थे, लेकिन इस बार का यादव मतदाता का मिजाज अलग था. फरवरी 2005 के चुनाव में अन्य कारणों के अलावा लालू का यादव वोट छिटकने की वजह शायद ये थी कि दो बड़े यादव नेता पप्पू यादव और साधु यादव लालू का साथ छोड़ गए और उनके दुर्ग की दीवार में बड़ी छेद कर गए.

बिहार में जिस तरह से चुनावी हवा चल रही है सभी राजनीतिक पार्टियां इसी समीकरण को साधने में एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रही हैं। बिहार में जातिगत समीकरण की बिसात पर शह देने की होड़ तो शुरु हो गई लेकिन देखना ये है कि

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