कमलनाथ के नेतृत्व पर अब कांग्रेस में ही संशय

भोपाल– प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और अपने समर्थकों की तरफ से राज्य में पार्टी का मुख्यमंत्री पद का चेहरा कहे जा रहे कमलनाथ के लिए फिलहाल आसार ठीक नहीं दिख रहे हैं। जो संकेत मिल रहे हैं, उनसे यह लगता है कि कांग्रेस ने कर्नाटक के नतीजों के बाद मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री पद के दावेदार का नाम अभी घोषित करने की बजाय इस मसले पर सस्पेंस कायम रखने का मन बना लिया है। नाथ के लिए जटिल परिस्थिति यह भी कि कर्नाटक के प्रयोग के अलावा और भी कई फैक्टर नाथ के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं।

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कर्नाटक में कांग्रेस ने भले ही सिद्धरामैया को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन यह निर्णय परिणाम आने के बाद लिया गया। चूंकि इस राज्य में पार्टी की जीत में राज्य इकाई के अध्यक्ष डीके शिवकुमार का बहुत बड़ा योगदान रहा, इसलिए यदि चुनाव के पूर्व ही सिद्धरमैया या शिवकुमार में से किसी एक का नाम घोषित कर दिया जाता तो बहुत मुमकिन था कि दोनों नेताओं के बीच खींचतान का पार्टी को नुकसान उठाना पड़ जाता।

कांग्रेस इसी सस्पेंस की दम पर वर्ष 2018 में मध्यप्रदेश (कमलनाथ-ज्योतिरादित्य सिंधिया) राजस्थान (अशोक गहलोत-सचिन पायलट) और छत्तीसगढ़ (भूपेश बघेल-टीएस सिंहदेव) के चुनाव में जीतने में सफल रही थी। तीनोँ जगह मुख्यमंत्री पद के दो दवेदारों ने अपनी-अपनी संभावनाओं के चलते जीत के लिए जमकर ताकत झोंकी और सफलता पार्टी को मिल गयी। अब यही फार्मूला एक बार फिर मध्यप्रदेश में दोहराया जा सकता है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा का मंगलवार को दिया एक बयान भी इन संभावनाओं को मजबूत करता है। खेड़ा ने यह बयान देकर नाथ और उनके समर्थकों के बीच सांसत वाली स्थिति पैदा कर दी है कि आने वाले विधानसभा चुनाव चेहरे नहीं, बल्कि मुद्दों पर आधारित होंगे।


अंदरखाने की खबर यह कि मध्यप्रदेश को लेकर बात केवल फॉर्मूले को दोहराने की नहीं है। कांग्रेस को यह भय भी सताने लगा है कि 1984 के सिख-विरोधी दंगों को लेकर गंभीर आरोपों के चलते नाथ को सामने रखकर चुनाव लड़ना घाटे का सौदा हो सकता है। गौरतलब है कि नाथ के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद उनके इंदौर में सिखों के एक कार्यक्रम में जाने को लेकर इस समाज के असरकारी लोगों ने ही जमकर आपत्ति जताई थी।

-सिख विरोधी दंगों का प्रेत फिर उठ खड़ा हुआ
-नेतृत्व को लेकर एकमत भी नहीं प्रदेश के नेता

इससे पहले भी नाथ को कांग्रेस की पंजाब इकाई का प्रभारी बनाया गया था। इस निर्णय के साथ ही सिख-विरोधी दंगों का मसला इतनी तेजी से उठा था कि कांग्रेस को चौबीस घंटे से कम समय में नाथ के नाम की घोषणा वापस लेना पड़ गई थी।

इधर, मध्यप्रदेश में दो दिन पहले ही राज्य भाजपा अध्यक्ष वी डी शर्मा ने भी जिस तरह आपातकाल और सिख-विरोधी दंगों के लिए नाथ को घेरा, उससे स्पष्ट है कि यह विषय भाजपा पूरी ताकत से उठाती रहेगी और चुनाव में नाथ को तवज्जो देने का असर राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में भी हो सकता है, जहां मध्यप्रदेश के साथ ही विधानसभा चुनाव होने हैं।

REPORT BY-बृजेश चौकसे

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