देश में भाजपा को संघ से दूरी भारी पड़ गई ,देखिये ये खास रिपोर्ट

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उत्तर प्रदेश में भाजपा को संघ से दूरी भारी पड़ गई। जिलों में न तो संघ और भाजपा की समन्वय समितियां दिखीं और न ही डैमेज कंट्रोल के लिए बैठकें हुईं। भाजपा ने प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनावी रणनीति तैयार करने तक में भी संघ से परामर्श नहीं लिया। लोकसभा चुनाव में करीब आधी सीटों तक सिमटने वाली भाजपा की हार के भले ही कई कारण गिनाए जा रहे हों, पर संघ से दूरी भी एक बड़ी वजह है।

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संभवतः यह पहला चुनाव है जिसमें भाजपा ने प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनावी रणनीति तैयार करने तक में भी संघ से परामर्श नहीं लिया। लिहाजा संघ ने भी खुद को अपने वैचारिक कार्यक्रमों तक ही समेटे रखा। लोकसभा चुनाव 2024 में इस बार उत्‍तर प्रदेश ने देश की सियासत को झकझोर कर रख दिया। यूपी में भाजपा को तगड़ा झटका लगा, वहीं इंडी गठबंधन को बड़ी ताकत मिली। यूपी में जो एनडीए गठबंधन 2019 में 64 सीटों पर खड़ा था, वही 2024 में 36 सीटों पर फ‍िसल गया। वहीं इंडी गठबंधन यान‍ि सपा और कांग्रेस पिछले चुनावों में 6 सीट जीत सके थे, उन्‍होंने इस बार 43 सीटों पर परचम लहरा दिया। भाजपा के इस बेहद खराब प्रदर्शन में कहीं न कहीं राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की नाराजगी को भी कारण माना जा रहा था। इसी क्रम में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान को भी जोड़कर देखा जा रहा है। पूरा मामला क्‍या है आइए विस्‍तार से समझते हैं…
आइये आपको बताते है आखिर संघ बीजेपी से लोकसभा चुनाव से दुरी क्यों बना ली। तो सबसे पहली वजह आपको हम ये बता दे कि चुनावी प्रबंधन में संघ परिवार और भाजपा में दूरी दिखी,दूसरी सबसे बड़ी वजह बीजेपी अपने आपको संघ से अलग देखने लगी थी और बीजेपी को अब ये लगाने लगा था कि उन्हें अब संघ की आवश्यकता नहीं हैं ,तीसरी सबसे बड़ी वजह बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने टिकट देते समय संघ की एक भी बात नहीं मणि जिसका खामियाजा बीजेपी को कई राज्यों में भुगतना पड़ा ,

चौथा कारण है jp नड्डा का बयान कि हमे संघ की आवश्यकता नहीं हैं हम अकेले ही चुनाव जीत लेंगे ,लोकसभा चुनाव के दौरान द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में बीजेपी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय और मौजूदा समय में काफी कुछ बदल चुका है। उन्‍होंने कहा कि पहले हम इतनी बड़ी पार्टी नहीं थे और अक्षम थे, हमें आरएसएस की जरूरत पड़ती थी, लेकिन आज हम काफी आगे बढ़ चुके हैं और अकेले दम पर आगे बढ़ने में सक्षम हैं।जेपी नड्डा ने कहा था कि पार्टी बड़ी हो गई है और सभी को अपने-अपने कर्तव्य के साथ भूमिकाएं मिल चुकी हैं। आरएसएस एक सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन है और हम एक राजनीतिक संगठन हैं। यह जरूरत का सवाल नहीं है। यह एक वैचारिक मोर्चा है। वो वैचारिक रूप से अपना काम करते हैं और हम अपना। हम अपने मामलों को अपने तरीके से मैनेज कर रहे हैं और राजनीतिक दलों को यही करना चाहिए।पांचवा सबसे कारण ये है कि बीजेपी के तमाम बड़े नेता इस बार संघ के लोगों का न पोलिटिकल राय लिये और न हर बार की तरह फीडबैक लिए ,नतीजा ये रहा जिस प्रकार से संघ हर चुनाव में लोकसभा हो या विधानसभा पहले ही उस विधानसभा में कई सो बैठके करके जनता को पार्टी की तरफ मोड़ने का काम करती थी और नेतावों फीडबैक देती वो इस बार नाराजगी की वजह से संघ ने नहीं दिया और अपने आपको संघ ने अपने वैचारिक कार्यक्रमों तक ही समेटे रखा। ,

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