बीजेपी के सहयोगी दलों ने बीजेपी को दिखाई आंखे, आगे होने वाला है बड़ा खेल

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लोकसभा चुनाव में जो रिजल्ट आया हैं ,वो न सिर्फ बीजेपी को परेशान कर रहा बल्कि बीजेपी के सहयोगी दलों को भी प्रभाभित किया हैं ,इसलिए अब बीजेपी के सहयोगी दल उत्तर प्रदेश में अपनी जनाधार को बढ़ाने के लिए बीजेपी पर हमलावर दिख रहें ,सबसे बीजेपी के सहयोगी दाल के नेता ओम प्रकाश राजभर ने ने अपने बयान में कहा कि मोदी और योगी को जनता पसंद नहीं कर रही उसके बाद अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल ने योगी को पिछडो के नौकरी को लेकर योगी चिट्टी लिखकर विरोध दर्ज कराया ,चलिए आपको इसके पीछे का कारण बताते है कि आखिर बीजेपी के जो सहयोगी दल है वो अपने ही सहयोगी दल आखें क्यों दिखा रहे हैं , तो चलिए शुरू करते हैं ,कुछ दिन पहले अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने जिस तरह से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को नौकरियों में आरक्षण पर पत्र लिखा, वह काफी चर्चा में रहा। हालांकि, यूपी लोक सेवा आयोग ने उनके आरोपों का जवाब देकर मामला शांत करने की कोशिश की, लेकिन मामला थमता नहीं दिख रहा है। वैसे राजनीतिक जानकारी इस चिट्ठी को उस कोशिश से जोड़कर देखते हैं, जिसके मार्फत वह अपना कुनबा बचाए रखने की कोशिश में जुटी हैं। अपना दल का बेस वोट बैंक कुर्मी है, जोकि इस बार छिटक गया था। न केवल अनुप्रिया, बल्कि निषाद पार्टी और सुभासपा भी इसी कोशिश में हैं कि उनका वोट बैंक उनकी पार्टी के साथ बना रहे।

इसमें कोई दो राय नहीं कि अखिलेश यादव की पीडीए की तरकीब, संविधान और आरक्षण बचाने की मुहिम ने इस लोकसभा चुनाव में कई क्षेत्रीय पार्टियों को धराशायी किया है। बीते दो लोकसभा चुनावों में 100 फीसदी का स्ट्राइक रखने वाली अपना दल इस बार एक ही सीट पर चुनाव जीत सकी। वह भी मिर्जापुर की, जहां से अनुप्रिया लड़ रही थीं। इस बार उन्हें भी जीत भारी अंतर से नहीं मिली थी। वहीं, राजभर और इसकी सहयोगी जातियों में अच्छी पैठ रखने वाले ओम प्रकाश राजभर अपने बेटे अरविंद राजभर को गाजीपुर की सीट नहीं जितवा सके। वह भी तब जबकि गाजीपुर राजभर बहुल लोकसभा क्षेत्र है। इसके अलावा निषाद पार्टी के भाजपा में सहयोगी होने के बावजूद निषादों ने अपना समर्थन सुल्तानपुर सीट पर सपा के सिंबल पर इंडिया ब्लॉक के प्रत्याशी रामभुआल निषाद को दिया। वह पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को हराकर लोकसभा पहुंचे हैं।कहने को तो ये तीन-चार सीटें हैं, लेकिन अगर गौर किया जाए तो ये भाजपा के सहयोगी क्षेत्रीय पार्टियों के बेस वोट छिटकने की कहानी कह रहे हैं। यही वजह है कि अब लोकसभा चुनाव बीतने के बाद ही सभी क्षेत्रीय पार्टिया उस कोशिश में जुट गए हैं कि वे अपनी जातियों के बीच मजबूत संदेश दे सकें। उनकी नाराजगी दूर कर सकें और उन्हें अपनी पार्टी के साथ जोड़े रख सकें। अनुप्रिया की चिट्ठी तो काफी चर्चा में रही, लेकिन भाजपा सरकार में सहयोगी दल के मंत्री डॉ. संजय निषाद का बयान भी कम महत्वपूर्ण नहीं रहा। उन्होंने कहा कि आरक्षण के मसले को सही तरह से एड्रेस न करने वाली पार्टियों को नुकसान उठाना पड़ा है। अगर हमने भी सही तरह से इस मसले को नहीं समझा तो हमें भी नुकसान उठाना पड़ेगा।

चुनौतियां काफी हैं सहयोगी दलों के सामने चाहे अपना दल (सोनेलाल) हो या सुभासपा या निषाद पार्टी। सभी क्षेत्रीय दल वन मैन शो सरीखे हैं। वहीं, पीडीए का नारा लेकर बढ़ रही सपा और लोकसभा चुनाव में उसकी सहयोगी रही कांग्रेस अगले विधानसभा चुनावों में इन जातियों से नेताओं को खड़ा करके इन क्षत्रपों की पॉलिटिक्स को डेंट करने की तैयारी में है। इस बार भी इन जातियों से राम भुआल निषाद, रमाशंकर राजभर और एसपी सिंह पटेल लोकसभा पहुंचे हैं। इनका इस्तेमाल इनकी जातियों के बीच पैठ बनाने के लिए किया जा सकता है। ऐसे में सपा और कांग्रेस इस दिशा में कदम आगे बढ़ाएं उसके पहले ही ये क्षेत्रीय दल अपने-अपने कुनबे को बचाने की कोशिशों में जुट गए हैं।

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